भाषा क्षमता कम हो रही है

आजकल हम रोज देखते हैं कि विभन्न कार्यक्रमों में लोग जो भाषा बोलते हैं वो इतनी हलकी होती है कि समझ में नहीं आता कि भाषाओं के मामले में समृद्ध भारत को क्या होता जा रहा है?  शिक्षा के तमाम अवसरों के बावजूद पढ़-लिखे लोग भी अनपढ़ों के बराबर ही लगते हैं। टीवी के विभिन्न चर्चा वाले कार्यक्रमों को देखिये, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं को देखिये, नेताओं द्वारा दिये जाने वाले बयानो को देखिये, फिल्मों के संवादों को देखिय् संसद में होने वाली बहसों को देखिये आपको स्वयं समझ में आ जायेगा कि किस प्रकार की भाषा का प्रयोग होने लगा है।

 

देश में अब गंभीर किस्म की चर्चाओं, वार्ताओं, गंभार विषयों पर बहस कम हो गई है। अब देश में क्रिकेट, आरुषि हत्याकांड, रुचिका कांड, ठाकरे मराठी मानुस, राहुल गांधीं इत्यादि विषयों पर बहस ज्यादा होती है। अंग्रेजी वालों ने तो कुछ कुछ चर्चा की लेकिन हिंदी वालों ने तो पचौरी और ग्लेशियरों के पिघलने और मौसमी परिवर्तन पर कुछ भी चर्चा नहीं की।

 

एक जमाने में हिंदी फिल्मों जोरदार किस्म के संवाद लिख जाते लेकिन अब गाली-गलौज भी  फिल्मों का हिस्सा  बनते जा रहे हैं। पिछले कई दिनो  के टीवी चैनलों को देखकर स्पष्ट है कि अब देश में गंभीर सार-गर्भित चर्चाओं का जमाना गया। अब संसद में सबसे ज्यादा लालू प्रसाद और उनकी जैसी भाषा बोलने वाले लोगों को ज्यादा प्रचार मिलता है।

 

इसके पीछे कई कारण हैं। अब भारत में अंग्रेजी स्कुलों और पब्लिक स्कुलों का जमाना है जहां पर बच्चों से अपनी भाषा में सोचने, बोलने का बजाय जबर्दस्ती अंगरेजी भाषा लादी जाती है। उपर से इंटरनेट और मोबाइल के जमाने में छोटा लिखने को प्रोत्साहित किया जाता है।  परीक्षाओं में भी अब वस्तुनिष्ठ (ओब्जेक्टिव टाइप) प्रश्न पूछे जाते है। ऐसे में छात्रों की भाषा पर पकड़ कमजोर ही रहती है।  अब हम लोगों में अपने विचार  अच्छी भाषा में प्रगट करने की क्षमता कम होती जा रही हैं। 

4 comments:

Fauziya Reyaz said...

manisha ji, baat to aapki sahi hai magar iske doshi hum khud hi hain...

युग मानस yugmanas said...

आपने सही कहा है । भाषा आज विवाद का मुद्दा भी बन चुका है । भाषाओं को प्राचीन भाषा का दर्जा दिलाने, करोड़ों की राशि के लिए जितने प्रयास किए जा रहे हैं, उनकी तुलना में बच्चों की भाषाई क्षमता के विकास के लिए किए जा रहे प्रयास न के बराबर है । इस स्थिति को बदलने के लिए हमें अवश्य कुछ करना चाहिए । - डॉ. सी. जय शंकर बाबु

Nishant said...

agar hamara bacha english nahi bolta to hamko sharm aati hai our agar hamara bacha english achi bolta hai our hindi tutifuti bolta hai to ham garv se khate hai ki iski english achi hai magar hindi kamjor hai.

अंकुर गुप्ता said...

आपसे एक सौ एक फ़ीसदी सहमत.

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