आरक्षण अभी और कई तरीकों से लागू होगा

जिस तरह से सरकार अपने खर्चे कम न करके जनता पर और बोझा डालने के लिये नये नये कर (टैक्स) लगाने के तरीके ढूंढ़ती रहता है उसी तरह से राजनैतिक पार्टियां और नेता लोग अपना वोट बैंक बनाने के लिये नये नये वर्गों को आरक्षण का रास्ता दिखाता रहते हैं। देश में जरुरत अच्छी काम करने वाली सरकारों की है क्यों कि अगर सरकारें अच्छा काम करें तो सभी वर्गों का भला होगा और कोई भी ये नहीं कहेगा कि मुझे मौका नहीं मिला। लेकिन अपनी नाकामियों को छिपाने और नयो नयो वोट बैंक बनाने के च्क्कर में राजनैतिक दल आरक्षण के नये नये जुमले उछालते रहते हैं ताकि लोगों को लोगो ये लगे कि  राजनैतिक दल उनका कितना भला चाहते हैं। ये दल मुस्लिम, पिछड़े, एससी-एसटी, युवा कई तरह के आरक्षण की मांग करते रहते हैं लेकिन अपनी बमाई हुई सरकारों कुछ भी ऐसा नहीं करते हैं जिससे की आरक्षण की नौबत ही न आये। मुझे महिला आरक्षण के पास होने की तो खुशी है लेकिन मुझे आने वाले समय की तस्वीर दिख रही है कि अभी आरक्षण की ये बात बहुत आगे तक जायेगी। देखिये कैसे अभी आरक्षण होगा -

  1. महिलाओं के लिये लोकसभा और राज्यों की विधानसभायों में 33 प्रतिशत आरक्षण के बाद राज्यसभा में भी आरक्षण की मांग तो अभी से उठने लगी है।
  2. महिलाओं के लिये लोकसभा और राज्यों की विधानसभायों में 33 प्रतिशत आरक्षण में से भी पिछड़े, दलित और मुस्लिमों को आरक्षण की मांग कई दल कर रहे हैं।
  3. इसके बाद शिक्षा में महिलायो के लिये आरक्षण की मांग उठेगी।
  4. इसके बाद सरकारी नौकरियों  में महिलायो के लिये आरक्षण की मांग उठेगी।
  5. मुस्लिमों के लिये रंगनाथ मिश्र आयोग ने  आरक्षण देने की बात कही है और इस पर भाजपा को छोड़कर सभी दल तैयार हैं। देश की राजनीति को देखते हुये ये मांग सबसे पहले पूरी होगी।
  6. अनूसुचित जति और जनजाति के आरक्षण में परिवर्तित मुस्लिमों और ईसाइयों को आरक्षण देने की मांग पछले कुछ समय से हो रही है।
  7. समय समय पर न्याय पालिका में आरक्षण देने की वकालत की जा रही है।
  8. निजी संस्थानों (प्राइवोट सेक्टर) में आरक्षण के लिये काफी समय से प्रयास किये जा रहे हैं और सरकार इसके लिये प्रयत्नशील है।
  9. हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट नें पंचायतों में युवा के नाम पर एक नये प्रकार का आरक्षण देने पर रोक लगाई है। यानी सब प्रकार के आरक्षण के बाद युवा के लिये आरक्षण, बुजुर्गों के लिये आरक्षण इत्यादि की मांग उठाई जायेगी और अपने आप को इनका हितैषी बताया जायेगा।

 

आरक्षण से सभी लोग प्रभावित होते हैं। लेकिन जिस वर्ग को मिल जाता है वो आरक्षण के पक्ष में बाते करने लगता है और इसको अपना हक बताने लगता है भले ही ये माना जाता हो कि आरक्षण कुछ समय के लिये देना है। दरअसल वास्तविकता में आरक्षण असली जरुरतमंद को नहीं मिल रहा है, इसका फायदा  वही लोग उठा रहे हैं जो कि पहले से ही आगे हैं। वास्तव में दो ही वर्ग हैं संपन्न एवम गरीब और पिछड़े,  जिसमें संपन्न वर्ग गरीबों-पिछड़ों को आगे लाने के नाम पर अपने लोगों को फायदा पहूंचा रहे हैं। सोचने वाली बात है कि अगर देश में सरकारें अपना काम अच्छे से करें तो ये बात ही क्यों आये कि कुछ वर्ग पिछड़ गये हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रतिनिधित्व में आरक्षण

महिला होने  के नाते मुझे खुशी है कि आखिरकार 14 वर्षों के बाद संसद और राज्यों की विधानसभाओं  में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिये बिल पेश हो जायेगा। ये एक ऐतिहासिक क्षण है। इस प्रकार के आरक्षण के बाद बहुत कुछ बदलेगा। हालांकि व्यक्तिगत आधार पर मैं किसी भी प्रकार के आरक्षण के विरूद्ध हूं क्योंकि ये लोगो का प्राकृतिक और वास्तविक विकास नहीं करता है बल्कि ये अन्य लोगों के साथ अन्याय करता है, लेकिन फिर भी महिलाओं के लिये संसद और विधानसभा में आरक्षण एक अच्छा कदम है।  इसके विरोधी महिलाओं को पिछड़े, दलित, धार्मिक आधार पर बांट कर विरोध कर रहे हैं लेकिन ये बिल अब पास हो कर रहेगा। ये कोई पुरुषों और महिलाओं के बाच की लड़ाई नहीं है बल्कि महिलाओं के वास्तविक विकास की बात है।

आईपीएल के चाहने वाले दीवाने होते है क्या?

दिल्ली में आजकल एफएम रेडियो पर और टीवी पर भी विभिन्न चैनलों पर आईपीएल-3 (IPL-3) के लिये टिकटों की बिक्री के लिये विज्ञापन बज रहे हैं, और दिखाये जा रहे हैं। इन विज्ञापने को देख सुन कर तो ऐसा लगता है मानो आईपीएल देखने वालों को होश ही नहीं है कहां पर क्या बात करनी है? मसलन एक विज्ञापन में कुछ लड़के रेल से उतर कर जा रहे हैं और रेलवे के टिकट परीक्षक को देखकर उसे टिकट नहीं दिखाकर उसे आईपीएल का टिकट दिखाते हैं, दुसरे इसी तरह के विज्ञापन में एक आदमी सिनेमा हॉल की टिकट खिड़की पर जाली के पास की आईपीएल की टिकट मांग रहा है यानी आईपीएल के टिकट खरीदने वाले दीवानों (पागलों) की तरह कहीं भी आईपीएल का टिकट खरीदने पहुंच रहे हैं। एक और विज्ञापन में एक आदमी जिसकी पत्नी ने सिंगापुर भ्रमण के लिये टिकट खरीदने के लिये व्रत रखा होता है, आईपीएल का टिकट खरीद लाता है। मैं सोच रही हूं कि फागुन और बसंत के बौराने के मौसम का प्रभाव है या फिर अप्रैल फूल डे आने वाला है उसका असर है कि लोग आईपीएल के टिकट के लिये बौराये से घूम रहे हैं और दीवानों जौसी हरकते कर रहे हैं।

इन सेवाओं के प्रयोक्ताओं के नाम कब जाहिर होंगे?

हाल ही में दिल्ली में एक एक और कालगर्ल गैकेट का पर्दाफाश हुआ है जिसे एक बाबा शिवेन्द्र उर्फ राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ इच्छाधारी बाबा चला रहा था। इसके गिरोह में तमाम अच्छे घरों की लड़कियां शामिल थीं। जैसे ही बाबा के पकड़े जाने की खबर आई वैसे ही मीडिया ने चटखारे लेकर खबर को दिखाना शुरु कर दिया। बताया जाने लगा कि बाबा का कारोबार पूरे भारत में फैला था, कि कालगर्ल के इस धंधें में कई पढ़ी-लिखी लड़कियां और महिलायें शामिल था, कि कैसे बाबा ने अपने आश्रम में व्यवस्थायें कर रखीं थीं, कि बाबा का कारोबार 2000 करोड़ रुपयो का है, इत्यादि इत्यादि। कुछ टीवी चैनलों ने बाबा की कोई डायरी भी दिखा दी जिसमें लेनदेन और सेवा लेने वालों के नाम लिखे थे।

लेकिन इन नामो को कभी नहीं बताया जाता है। मीडिया भी इन नामों को छुपा जाता है। पुलिस जब भी किसी इस तरह के रैकेट को पकड़ती है तो उसके सरगना और पकड़े जाने वाली लड़कियों और औरतों के नाम तो बता दिये जाते हैं लेकिन कभी भी उनका नाम सामने नहीं आता जिन्होंने कॉलगर्लों की सेवायें ली थीं। बाबा का 2000 करोड़ का कारोबार बताया जा रहा है, जाहिर सी बात ये सब पैसा काला धान है जिसे कमाने वालों ने ही बाबा को दिया है उनकी सेवा के बदले में। यदि उन लोगों के नाम भी सार्वजनिक कर दिये  जायें जिन्होंने बाबा या अन्य किसी के द्वारा सेक्स के लिये लड़कियां मंगायी थी तो सब को पता चलेगा और सार्वजनिक बदनामी के डर से इस तरह के धंधे कुछ कमा भी होंगे और सरकार को बता चलेगा कि कौन लोग अपना काला धन कहां प्रयोग कर रहे हैं। दर्असल कालगर्ल संस्कृति के प्रयोक्ता अधिकांश बड़े सरकारी अधिकारी, नेता व समाज के बड़े-बड़े लोग है और इसीलिये हमेशा लड़कियों के नाम ही बाहर आते है लेकिन कभी उन पुरुषों के नाम बाहर नहीं आ पाते जो लोग ऐसे काम को प्रयोग कर उसे बढ़ावा दे रहे हैं। मेरे विचार में देश में जगह जगह पकड़ जा रहै सेक्स रैकेटों को चलाने वालों के अलावा उनके ग्राहकों को भी पकड़ कर उनके नाम सार्वजनिक किये जाने चाहिये।

हमारे एक्टर क्यो नहीं बोलते हैं?

जब मुंबई पर 26/11 का पाकिस्तानी हमला किया गया था तब वहां के राष्ट्रपति जरदारी ने कहा था कि ये नान-स्टेट एक्टर द्वारा किया गया काम है और इसमें पाकिस्तानी सरकार का कोई हाथ नहीं है। हाल ही में दुबई में इस्राइल के खुफिया विभाग मोसाद (सरकारी स्टेट एक्टर) ने जबर्दस्त खुफिया कार्यवाही को अंजाम देते हुये हमास के नेता को मार दिया।  दोनों ही तरह की घटनाओं को देखें तो पता चलता है अलग अलग तरह के स्टेट और नान-स्टेट एक्टर मिला कर किसी देश की कूटनीति और रणनीति चलती रहता है। पर भारत के संदर्भ में इसकी बात की जाय तो कोई भी एक्टर इस तरह का काम करता नजर नहीं आता। हाल ही में मुजफ्फराबाद और लाहौर में लश्कर के आतंकियों खासकर हाफिज सईद और अन्य ने भारत के खिलाफ जिहाद करने और भारत पर बम विस्फोट करने के भाषण दिये थे। कहने को तो भारत नें कई नान-स्टेट एक्टर जैसे कि आरएसएअ, बजरंग दल, विश्ल हिंदु परिषद, जमाते इस्लामी, मस्लिम स्वयम सेवक संघ, माओवादी नक्सली, हुरियत कांफ्रेंस और कई सरकारी स्टेट एक्टर जैसे कि रॉ, आईबी, सेना, पुलिस इत्यादि सब हैं लेकिन किसी ने भी हाफिज सईद की बात का विरोध नहीं किया, किसी ने नहीं कहा कि हम ईंट का जबाव पत्थर से देंगे, किसी ने नही कहा कि हम भी जैसे को तैसा जबाव देंगे, एक फिल्मा एक्टर नें जरूर कहा कि पाकिस्तान एक महान देश है और वहां के खिलाडियों को भारत में क्रिकेट खेलना चाहिये बाकी फिल्मी एक्टर चुप्पी लगा गये। आखिर एसा क्यों नही हो सकता कि  यहां पर भी पाकिस्तान की तरह से नान-स्टेट एक्टर पाकिस्तान को वैसा ही जवाब दें जैसा वहां के नान-स्टेट एक्टर भारत के लिये बोलते हैं। 

ई-गवर्नेंस से किसे फायदा हो रहा है?

आज से राजस्थान की राजधानी जयपुर में 13 वां राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस (ई-शासन) का सम्मेलन हो रहा है  जिसमें देश के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, उनके विभाग, राज्य सरकारें एवं अन्य लोग भाग ले रहे हैं। देश में ई-गवर्नेंस  को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर एवं महत्वाकांक्षी रुप में पेश किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि सूचना प्रौद्योगिकी  की ई-गवर्नेंस  प्रणालियों से देश को और देश की जनता को बहुत फायदा पहुंच रह है या पहुंचने वाला है। लेकिन मेरे विचार में ऐसा नहीं है। ई-गवर्नेंस   से कुछ फायदा तो हो रहा है लेकिन ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है। इस बारे में मेरे विचार कुछ इस प्रकार हैं -
  1. सिस्टम वही का वही - ई-गवर्नेंस   प्रणालियां तो बन गई हैं लेकिन उनसे प्रशासनिक अव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। मिसाल के लिये अगर जन्म-मृत्यु के प्रमाण पत्र को लेने में अगर पहले 5 दिन लगते तो कंप्युटरीकरण के बाद भी इतने ही दिन लगते हैं यानी कि काम अभी भी उसी गति से हो रहा भले ही कंप्यूटर के ऊपर भारी खर्चा हो गया है। इसी तरह से आयकर के कंप्यूटरीकरण के बावजूद लोगों को आयकर का रिफंड लेने के लिये उतने ही धक्के खाने पड़ रहे हैं जितने की पहले। या फिर आय कर का रिटर्न भरना आज भी उतना ही जटिल है जितना पहले था। यानी ई-गवर्नेंस    का फायदा आम आदमी को नहीं पहुंचा है।
  2. मंहगा - ई-गवर्नेंस    के नाम पर लोगो को मिलने वाली सुविधायें मंहगी कर दी गई हैं मसलन रेलवे के टिकट पर कंप्यूटर के नाम पर सरचार्ज लगता है। या फिर उदाहरण के तौर पर दिल्ली में कंप्यूटर और स्मार्ट कार्ड वाले वाहन रजिस्ट्रेशन और वाहन लाइसेंस  की फीस बढ़ा दी गई है यानी लोगों को फायदा तो कुछ नहीं हुआ पर आर्थिक नुकसान जरुर हो गया।
  3. हिंदी और क्षेत्रीय भाषायों को नुकसान – अधिकांश कंप्यूटरीकरण व ई-गवर्नेंस     एप्लीकेशंस अंग्रेजी भाशा में हैं आम जनता की भाषा में नहीं। जैसे तैसे देश में राजभाषा के काम को बढ़ाया जा रहा था लेकिन ई-गवर्नेंस     के बाद उस पर पानी फिर गया है। जरूरत आम आदमी की भाषा में ई-गवर्नेंस     प्रणालियों की है।
  4. बाबुओं को फायदा - ई-गवर्नेंस     के नाम पर करोड़ों रुपये की योजनाये बना कर खरीदारी की जा रही है जिसमें जाहिर सी बात है कि क्या उद्देश्य रहता है।
  5. भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं - ई-गवर्नेंस     से कहीं भी किसी भी सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लग सकी है यानी सब कुछ वैसै ही चल रहा है।
ई-गवर्नेंस     कई जगह पर सफलता पूर्वक भी चल रहा जैसे कि रेल व हवाई यात्रा में रिजर्वेशन में। अधिकांश ई-गवर्नेंस     वहां तो सफल है जहां पर पैसे का लेन देने है, वाकई इससे आसानी हो गई है। लेकिन जब तक ई-गवर्नेंस     से आम जनता को परेशान करने वाली व्यवस्था नहीं बदलती तब तक ये सिर्फ एक ढोल पीटने जैसी बात रहेगी।

आखिर भारत का संयम खत्म हो ही गया

कुछ दिन पहले पाकिस्तान में अमेरिका के रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने यह कहा था कि कि भारत का संयम खत्म हो सकता है। इसका सभी समाचार माध्यमों ने यह अर्थ निकाला था कि भारत पाकिस्तान की तरफ से किसी भी प्रकार के आतंकी हमले के लिये जैसे को तैसा की तर्ज पर कार्यवाही करेगा। 26/11 के आतंकी हमले का बाद से भारत ये कह रहा था कि पाकिस्तान अपने यहां के आतंकियों के खिलाफ कार्यवाही करे और तभी पाकिस्तान के साथ बातचीत की जा सकेगी। लेकिन अब पता चला रहा है कि राबर्ट गेट्स का मतलब ये था कि भारत तो बातचीत करने के लिये अपना धैर्य खो सकता है, यानी भारत तो तैयार बैठा था बातचीत करने के लिये। अब भारत ने अपनी तरफ से बिना किसी कारण के, बिना किसी प्रकार की उपलब्धि पाये, बिना तैयारी के पाकिस्तान के साथ बातचीत की पेशकश की है तो ये ही माना जाना चाहिये कि बात न करने का  भारत का संयम खत्म हो गया है। पाकिस्तानी तो हमेशा शायद जानते थे कि भारत जरूर एक दिन बात करेगा इसीलिये उन्होंने भारत की बात नहीं मानी और आतंकी संगठनों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की और अब तो वो अपने मुंह मिया मिठ्ठू भी बन रहे हैं कि उनकी वजह से भारत को बातचीत के लिये राजी होना पड़ा। भारत सरकार को कम से कम अपनी जनता को बताना ही चाहिये कि आखिर इतने दिनों बात न करने के बाद अब क्या उपलब्धि मिल गई जो बातचीत शुरु की जा रही है? भारत की सरकारें ऐसे ही तेवर दिखाती हैं और फिर वापस पाकिस्तान से बात शुरु कर देती हैं जिसका जबाव वहां से एक और नये आतंकी हमले के रुप में आता है।